प्रभु की लीला औ, जयदेव लीला का गान सुनो!
गीतगोविन्द कैसे रचा?
कैसे बढा?
भक्त का मान सुनो!
एकदिन जयदेव के मन में नवल भाव समाया
प्रभुलीला का दिव्य ग्रन्थ लिख अमृतरस बरसाया
जिस प्रभु लीला का नित्य उर आँगन में करता दर्शन
लिखूँ उस लीला को पावन करूँ रस बर्षण
कर लूँ निज वाणी को पवित्र
प्रभुलीला गान कर बन जाऊँ सर्व समर्थ
जिसने भी प्रभु के सरस प्रेम रस का पान किया
उन्हीं संत ह्रदयों ने प्रभु का ह्रदय से दर्श किया
जयदेव सरसरस गीतगोविन्द को लिखने लगे
श्रीकृष्ण के पावन प्रेम को भरकर पदों में रचने लगे
एक दिन आया ,एक विलक्षण भाव
श्यामसुन्दर को है विरह ताप का संतप्त भाव
श्रीकृष्ण, श्रीकिशोरीजूं से करते हैं आराधना
मस्तक चरण कमल धर पूरी करो मेरी साधना
सोचने लगे जयदेव गुप्त रहस्य है ये, इसे कैसे करूँ प्रकट
संकोच हुआ, कलम रूकी समस्या बनी बडी विकट
संध्या समय हुआ, स्नान बेला आई, जयदेव गए तट पर
भगवान रखते भक्तों का मान, आ गये जयदेव के घर पर
भक्तप्रेम पर हो बलिहारी, प्रभु को रूप बदलते देखा
अपना मान टले टल जाये पर भक्त का मान न टलते देखा
जयदेव रूप धरि प्रभु घर आँगन में आये
पद्मावती से माँग के पोथी, मन भाव पद में सजाये
पद्मावती ना जान सकी यह राज
जयदेव रूप धारी श्रीकृष्ण घर आये हैं आज
बिना स्नान, ध्यान किये कैसे लौटे नाथ!
अभी तो गये थे तुम, फिर पलट कर क्यों लौटे नाथ!
अरे , हाँ! हो ना जाये कहीं मुझे विस्मरण
इसलिए अभी पूरा कर देता हूँ वर्णन
लाओ, मुझको पोथी दो करता हूँ छंदबद्ध
फिर, मुझको भोजन देकर कर दो क्षुधा निवृत्त
प्रभु ने जयदेव के मन की पंक्ति को पूर्ण किया
पद्मावती का आतिथ्य स्वीकार कर भोग ग्रहण किया
प्रभु पंक्ति पूर्ण कर, भोग लगा आँखों से दूर हुये
जयदेव लौटे, देखकर पद्मावती को भोजन पाते, आश्चर्य से चूर हुये
जयदेव चौंके, रोका, बोले ~ आज तुमने पहले भोजन कैसे पाया?
तुम तो नियमधारी हो, पतिभोजन पश्चात की ही व्रतधारी हो!
बोली ~पद्मावती, अहो नाथ!
ये कैसी कह दी अनोखी बात?
पोथी लिखकर पूरे कर डाले जैसे थे आपके भाव
भोजन करके अभी तो गये हो नाथ!
जयदेव दौडे, पोथी खोली, देखा तत्काल
जो नहीं लिख पा रहे थे, वही भाव लिख गये थे नंदलाल
जयदेव समझ गये प्रभु की सुन्दर लीला
ह्रदय गद्गद, अधीर, परम प्रसन्न सुशीला
जयदेव रूप में भगवान श्रीकृष्ण कविता पूर्ण कर गये
गीतगोविन्द का छन्द लिखकर ग्रन्थ सम्पूर्ण कर गये
जयदेव हुये अति प्रसन्न
पद्मावती तुम्हारा सौभाग्य अखंड
ईश्वर ने तव हस्तों से भोजन पाया है
हमें करके परम निहाल, तुमने दर्शन का सौभाग्य पाया है
हे कृष्ण! हे नंदनंदन!!हे राधावल्लभ!!!
हे दीनदयाल!!!! हे करूणासिंधु!!!!! हे गोपीजनवल्लभ !!!!!!
तुम्हारी शक्ति अपार, भक्तों के ह्रदय में पल ~पल समाये हो
भक्तों के प्रेम की खातिर रूप बदल, बदल कर आये हो
तुम्हें बारम्बार नमस्कार, ह्रदयभाव अर्पण है
गीतगोविन्द की रचना पूर्ण करने में मेरा तुम्हें सर्वस्व समर्पण है ||
सीमा गर्ग " मंजरी "
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