विज्ञापन

बट गई भूमि,बट गए द्वार और बटा परिवार

Saurabh dixit

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            राहों पर अंधेरो से लगता है डर
        
                                                    
                            
मानो साँसे थम सी गई हो बीच डगर

यह अंधेरा है स्वार्थ,अहि मन धोखो का
बेचैन सी निगाहे देखती हरकत लोगो का

लोभी मन पैसो का,पैसा ही मानो धड़कन
अपनो में ही लड़ाई, वे कभी संग थे बचपन

बट गई भूमि,बट गए द्वार और बटा परिवार
सहसा खत्म हो गई खुशिया,खत्म हो गया प्यार
-सौरभ दीक्षित
एक दिन पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Dn Chaubey

7573 कविताएं

View Profile