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बज़्म की राह

SATYANIDHI DWIVEDI

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            गलियों गलियों फिरता रहा जो
        
                                                    
                            
उसे अब वो कहाँ रहन का ठौर मिले
हारा अक्सर अपनों से ही जो
उसे जीत का कहाँ वो फिर दौर मिले
वो नासमझी के दायरे तोड़़ तेरी
जब राह चला भटकन ही मिली
उसे अब वो शूकून के भोर मिले
इक शख्स तेरे शहर में बेसाख्ता
अब कुछ खास खोजता है
खुद के मरहम के लिए बेशक
नीला पलाश खोजता है
राहों अक्सर घाव मिले
वो सब नागहा गैंर हुए
काटें ही कांटे हाथ लगे
उसे चुनने थे जो अपने लिए
अब न उसे वो छोर मिले
-सत्यनिधि द्विवेदी अंशिल
3 दिन पहले
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