गलियों गलियों फिरता रहा जो
उसे अब वो कहाँ रहन का ठौर मिले
हारा अक्सर अपनों से ही जो
उसे जीत का कहाँ वो फिर दौर मिले
वो नासमझी के दायरे तोड़़ तेरी
जब राह चला भटकन ही मिली
उसे अब वो शूकून के भोर मिले
इक शख्स तेरे शहर में बेसाख्ता
अब कुछ खास खोजता है
खुद के मरहम के लिए बेशक
नीला पलाश खोजता है
राहों अक्सर घाव मिले
वो सब नागहा गैंर हुए
काटें ही कांटे हाथ लगे
उसे चुनने थे जो अपने लिए
अब न उसे वो छोर मिले
-सत्यनिधि द्विवेदी अंशिल
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