काव्य : चंद्रकांता
शीर्षक : आठों पहर
आठों प्रहर यामिनी का
प्राणों की तरंगों में घुमड़-घुमड़ी
उतराती स्वर्णिम तरिणी।
आत्म उसांस प्राणंत में कैसी ये भीति
विश्व विदित वारींद्र की पद्धति रीति
इतनी क्यूँ प्रचंड इस मंजुल से प्रीति
अमंद-मंद-गति से बढ़ती जाती
अगाऊ-अरिष्ट-उर्ध्वमुख त्रिदिव-सिहरी।
सकेगी पहुँच न क्यूँ नियति पर पार
खुद के जीवन की अति अकुंठ धार
आत्मन का सपन – सा समाहार
तैरते को कैसा भय यहाँ
धुंधली-धरुण-जलराशि कहाँ औंड़ी
आठों प्रहर यामिनी का
प्राणों की तरंगों में घुमड़-घुमड़ी।
औड़ी = गहरा, अगाऊ = पहले से, अरिष्ट = कष्ट, उर्ध्वमुख = उन्मुख, त्रिदिव = तीनों प्रहर का सुख, वारींद्र = समुद्र, तरिणी = नाव।
सतीश शेखर श्रीवास्तव “परिमल”
सिंगरौली (मध्यप्रदेश)
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।