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बाती-सा जलता जीवन

Satish Shekhar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हृदय में वेदना पसीजती है
        
                                                    
                            
अँखियों में पुष्कर उफनती हैं।
बूँदें आसूँ की मन जैसी निर्मल है
पर ये जीवन बाती-सा जलता है।।

शापित हारे हुए प्राणों को
हिमालय ने अटल विश्वास दिये
घायल – व्याकुल अधरों को
मंजुल मधुरता का ऋतुराज दिये।
मेरी जीवंतता ही गिरिराज-का बोध ले
अंतस् जंगुल-ज्वाल पी-पीकर पिघलता है।।

बोये मैंने संदल के बीज कानन
कंटक बबूल कहाँ से उग आये
रह-रहकर चुभते हैं पलकों पर
सुगंधित सुख – सपनों के फूलों से।
बँधे हुए शिशिर के आँचल में जीवन
पर मुझको हर ऋतुऐं क्यों छलती हैं।।

पर संकल्प मेरे शिखर गगन छूने वाले
गली-कूंचे-राहों में पंख-विहीन हो गये
निश्चय-विश्वासों ने लिया काट हमें
आसमानों के छोरों को अब कौन छुये।
चिर-आकुल आशायें वियोगिनी – सी
पिपासा में पली – बढ़ी विकलता हैं।।

पिये हँस – हँसकर हमने घूँट जहर के
हो – हल्ला भरे निहंग वीरानों में
ढूढोंगे तो तुम्हें भी मिल जायेगा विष
मेरी नम – नम ठहाकों में।
अब तो हर जख़्म सुलगता है
सोच-सोचकर नस-नस में लोहू उबलता हैं।।

क्यों छलती है तू रे मुझको
सुख – समृद्धि की दीवानी
खाकों में पड़ी जिन्दगानी मेरी
पल – पल आहों में मरती है।
मन नीर कणों सा निर्मल है
फिर भी जीवन बाती-सा जलता हैं।।

- सतीश शेखर श्रीवास्तव “परिमल”
सिंगरौली (मध्यप्रदेश)
3 वर्ष पहले
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