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तड़पती गोमाता की पुकार

Satish Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तड़पती गोमाता की पुकार
        
                                                    
                            
देवभूमि की लाज रखो, मत तोड़ो यह मान,
माँ समान गो पूज्य है, कर लो शीश प्रणाम।
दूध मिले तो पालते, फिर करते अपमान,
मानवता का धर्म है, रखना सदा अविराम॥१

बूढ़ी होती जब वह गौ, स्मरण करो उपकार,
जिसने पाला, पोषा तुमको, क्यों करते अपमान।
जंगल बाँधो क्यों उसे, भूख-प्यास से तड़पें,
तृष्णा में जब प्राण झरें, मानव कैसे न डरे॥२

सोचो कैसी वेदना, जो मूक नहीं कह पाए,
धरती रोती गौमाता पर, जब तृष्णा हर ले प्राण।
करुणा मरती जा रही, स्वार्थ बढ़ा हर ओर,
अधर्म यही विनाश का, बनता जग में शोर॥३

बैल नहीं जो खेत जोतें, यंत्रों ने सब खाया,
धरती काँपे, संतुलन भी, धीरे टूटे छाया।
श्रम मिटा, संस्कार गए, लोभ बना आधार,
प्रकृति करेगी न्याय अब, होगा फिर संहार॥४

कर्म तुम्हारे लौट आएँ, भूलो मत यह बात,
जो सताए प्राणियों को, पावे दुःख दिन-रात।
भक्ति वही सच्ची कहे, करुणा जिसमें हो,
गौसेवा ही पुण्य है, यही मोक्ष का द्वार॥५

जागो मानव! रोक विनाश, लौटो धर्म मार्ग,
गौ-संरक्षण सच्ची पूजा, यही सत्य अमर।
प्रेम, अहिंसा, दया रखो, यही धर्म का सार,
गौ की रक्षा से बचेगा, जीवन का आधार॥६

करुणा ही जीवन की जड़, यही सृष्टि का धर्म,
गोसेवा ही श्रेष्ठ तप है, यही सत्य का कर्म।
जो करे गोमाता की रक्षा, वही पुण्याचार,
वह रक्षक प्रकृति का कहलाए, मानवता का आधार॥७
 
10 महीने पहले
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