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जिम्मेदारी एक मौन अर्चा है

Satish Borkar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक नहीं, दो नहीं
        
                                                    
                            
तीन घंटे से ज्यादा लेट है
उस पर, बस इतना कहना
असुविधा के लिए हमें खेद है।
ख्वाबों की किसी दुनिया में ठहरी
नींद के आगोश में डूबी आँखों को,
वाश बेसिन के बहते नल से पानी लेकर
अपनी ही हथेलियों से जगाता है,
सपनों की कोमल दुनिया से
हकीकत की ठोस सतह पर वापस लाता है।
नीम रात,
जब बिस्तर पर सो रही होती है सारी दुनिया,
तब वो अपने सूने कमरे में तन्हा
घर से निकलने की तैयारी कर रहा होता है।
ड्यूटी ऑन करके,
प्लेटफॉर्म पर कुछ एक मुसाफिरों के साथ
रात नौ बजे की लोकल का
इंतजार वो कर रहा होता है।
पर वो ट्रेन
अपने प्रारंभिक स्टेशन पर,
अंतिम स्टेशन के पहुंच समय से
दो घंटे की देरी पर है...
यानी दो और दो,
पूरे चार घंटे की लेट-लतीफी पर है!
बड़ी ख़ामोशी से,
जैसे अमावस्या के बाद का चाँद निकलता है,
वैसे ही रात बारह चालीस को आई रेलगाड़ी...
बारह डब्बों में दस-पंद्रह सीटों को छोड़कर,
सारी बेसुध नीली सीटें हैं खाली।
डेमू की कैब में वो शख्स
सहायक से अपडेट लेता है,
सारी शर्तों की जाँच करता है...
स्टार्टर की एक पीली रोशनी के संकेत से,
सफर का आगाज होता है।
हेडलाइट की रोशनी से चमकती
रेल की पटरियों पर पूरा भार रहता है,
और कैब की धीमी रोशनी में
जागती उन्हीं आँखों में सफर का
सारा दारोमदार रहता है।
इंजन की सदाओं के बीच
कैब की ख़ामोशी को,
स्वर से स्वर मिलाती
सिग्नल कॉल आउट की आवाज अक्सर तोड़ती है;
कोई मुसाफिर उतरे न उतरे, चढ़े न चढ़े,
पर रेलगाड़ी हर स्टेशन पर रुकती है।
कई सारे सर्किट ब्रेकर और स्विच हैं,
एक डेड मैन हैंडल कैब के बीचों-बीच है...
जब तक गाड़ी चलती है,
हथेली उसे दबाए रखती है!
दौड़ती गाड़ी में आप पी नहीं सकते पानी,
अगर इसे छोड़ दें... तो रुक जाएगी रवानी।
प्रकृति की उन अंधेरी वादियों में,
जंगल, पहाड़ और नदियों में,
कॉशन बोर्ड से टीपी बोर्ड तक
प्रतिबंधित गति से चलना है;
इसी बीच हो अगर 'नेचर कॉल',
तो अपने आप से लड़ना है!
पटरी, सिग्नल, बोर्ड पर
लगातार अपनी नजर लगाना है,
उन नीले वर्दीधारियों का लक्ष्य
गाड़ी सुरक्षित गंतव्य तक पहुँचाना है।
न कोई बहस है, न कोई चर्चा है...
कैब के उन क्षीण उजालों में,
जिम्मेदारी एक मौन अर्चा है!

-सतीश बोरकर
5 घंटे पहले
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