सूरज की किरणों के सँग-सँग चलूँ
चन्दा की धरती पर हर रँग भरूँ
जेहन में जगती तमन्नाओं को
हकीकत में लाने की जंग करूँ
ऐसा क्यों सोचूँ ……ऐसा क्यों सोचूँ
जी चाहता है, समय रोंक दूँ
चाँद-धरती और सूरज को मैं रोक लूँ
कर दूँ रौशन जहां ये सदा के लिए
इस पागल अँधेरे को मैं सोख लूँ
ऐसा क्यों सोचूँ ……ऐसा क्यों सोचूँ
गीत गाऊँ इन पँछियों साथ मैं
मन कहे पेड़-पौधों के संग नाच लूँ
गर रहे साथ मेरा सदा इनके संग
तो इन पहाड़ों से कर बात लूँ
ऐसा क्यों सोचूँ ……ऐसा क्यों सोचूँ
हर सुबह एक नए रंग की हर रोज़ हो
चाँद-सूरज-सितारे मेरे दोस्त हों
बात ब्रम्हाण्ड की इनसे मैं कर सकूं
ताकि सारे जहां में नया ज़ोश हो
ऐसा क्यों सोचूँ ……ऐसा क्यों सोचूँ
इतनी शक्ति हमें दो ख़ुदाया मेरे
चलते तूफ़ान को जाम मैं कर सकूँ
उड़ सकूँ आसमाँ में मैं ऊँचे बहुत
ताकि एलिअन्स से बात मैं कर सकूँ
ऐसा क्यों सोचूँ ……ऐसा क्यों सोचूँ
खो गए तारों में, फिर ना आये कभी
कल्पना चावला और साथी सभी
जाऊँ अब वहां उनसे मैं मिल सकूँ
इन सितारों में खोने से मैं ना डरूँ
ऐसा क्यों सोचूँ ……ऐसा क्यों सोचूँ
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