सैलाब तू कितना भूखा था
केरल में जब आया था
इतना सब कुछ निग़ल गया
क्या दिल में तेरे समाया था
बच्चे, बूढ़े, ख़्वाब, अधूरे
गलियाँ, कूचे, चूल्हे, चौके
दिल के अरमाँ, यादें-मंज़र
सभी समा गए, तेरे अंदर
टूट गईं सब शाखें उसकी
खुशियों का जो बूटा था---
सैलाब तू कितना भूखा था
सैलाब तू कितना भूखा था
सतेन्द्र मनम
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