माँ ममता की अविरल धारा,
जो सींचती जीवन अंचल को।
कण-कण में संस्कार पिरोकर,
पनपाती जीवन शतदल को।
माँ ममता की अविरल धारा
जो सींचती जीवन अंचल को।
कल कल करती स्नेह सलिल-सी,
हृदयतल में बहती है।
आत्मतल से झरती बूंदें
प्रेम कहानी कहती है।
लहरों के संग लोरी गाकर
महकाती जीवन गुलशन को।
माँ ममता की अविरल धारा
जो सींचती जीवन अंचल को।
भगवान नहीं देखा मैंने,
पर माँ रूप में पाया है।
सहनशीलता अवनी जैसी,
अम्बर-सी ममत्व छांया है।
माँ का सरल सानिध्य ही
महकाता आरजू उपवन को।
माँ ममता की अविरल धारा
जो सींचती जीवन अंचल को।
मीठी वाणी मकरंद घोले,
माँ के मुंह बस खुशियां बोले।
आह को आहा में बदलकर
सन्तोष सरस जीवन रस घोले।
घोर अंधेरों से टकराकर,
रखती रोशन घर आंगन को।
माँ ममता की अविरल धारा
जो सींचती जीवन अंचल को।
तेरती निश्छल-सी छाया,
माँ के आशीष वरदानों में।
जज्बात जोश सीनें में भरती,
माँ की सीख तुफानों में।
माँ का मन वो मेघ श्रंखला
जो महकाये मौजिल खलिहानों को।
माँ ममता की अविरल धारा
जो सींचती जीवन अंचल को।
माँ झरनों का निर्मल स्वर है,
दुख में सुख का शस्त्र प्रखर है।
जब भी कोई संकट आए ,
कवच रूप में माँ आतुर है।
माँ समर की वह शमशीर है,
जो भयभीत रखें अरिदानों को।
माँ ममता की अविरल धारा
जो सींचती जीवन अंचल को।
बिन आह्वान के वंदन कर लो,
माँ की उज्ज्वल कहानी को।
मन मंदिर की मूर्त बनाकर,
पूजो माँ सर्वज्ञानी को।
माँ की ममता बरस-बरस कर,
फल देती जीवन उपवन को।
माँ ममता की अविरल धारा
जो सींचती जीवन अंचल को।
-संतराम शर्मा 'हिन्दी'