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माँ ममता की धारा

संतराम शर्मा 'हिन्दी'

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                            ‎माँ ममता की अविरल धारा,
        
                                                    
                            
‎जो सींचती जीवन अंचल को।
‎कण-कण में संस्कार पिरोकर,
‎पनपाती जीवन शतदल को।
‎माँ ममता की अविरल धारा
‎जो सींचती जीवन अंचल को।
‎
‎कल कल करती स्नेह सलिल-सी,
‎हृदयतल में बहती है।
‎आत्मतल से झरती बूंदें
‎प्रेम कहानी कहती है।
‎लहरों के संग लोरी गाकर
‎महकाती जीवन गुलशन को।
‎माँ ममता की अविरल धारा
‎जो सींचती जीवन अंचल को।
‎
‎भगवान नहीं देखा मैंने,
‎पर माँ रूप में पाया है।
‎सहनशीलता अवनी जैसी,
‎अम्बर-सी ममत्व छांया है।
‎माँ का सरल सानिध्य ही
‎महकाता आरजू उपवन को।
‎माँ ममता की अविरल धारा
‎जो सींचती जीवन अंचल को।
‎
‎मीठी वाणी मकरंद घोले,
‎माँ के मुंह बस खुशियां बोले।
‎आह को आहा में बदलकर
‎सन्तोष सरस जीवन रस घोले।
‎घोर अंधेरों से टकराकर,
‎रखती रोशन घर आंगन को।
‎माँ ममता की अविरल धारा
‎जो सींचती जीवन अंचल को।
‎
‎तेरती निश्छल-सी छाया,
‎माँ के आशीष वरदानों में।
‎जज्बात जोश सीनें में भरती,
‎माँ की सीख तुफानों में।
‎माँ का मन वो मेघ श्रंखला
‎जो महकाये मौजिल खलिहानों को।
‎माँ ममता की अविरल धारा
‎जो सींचती जीवन अंचल को।
‎
‎माँ झरनों का निर्मल स्वर है,
‎दुख में सुख का शस्त्र प्रखर है।
‎जब भी कोई संकट आए ,
‎कवच रूप में माँ आतुर है।
‎माँ समर की वह शमशीर है,
‎जो भयभीत रखें अरिदानों को।
‎माँ ममता की अविरल धारा
‎जो सींचती जीवन अंचल को।
‎
‎बिन आह्वान के वंदन कर लो,
‎माँ की उज्ज्वल कहानी को।
‎मन मंदिर की मूर्त बनाकर,
‎पूजो माँ सर्वज्ञानी को।
‎माँ की ममता बरस-बरस कर,
‎फल देती जीवन उपवन को।
‎माँ ममता की अविरल धारा
‎जो सींचती जीवन अंचल को।
‎ -संतराम शर्मा 'हिन्दी'
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‎
एक वर्ष पहले
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