करे जो इश्क शिद्दत से,
वही बदनाम हो जाए।
चर्चे जहां में हवा की
तरह सरे-आम हो जाए।
न पूछो हाल-ए-दिल
दीवानों का,
इस बस्ती के तपते हुए
सहरा में,
कोई पैगाम हो जाए।
लिखी जो हमने चाहत
की कहानी,
पन्नों से उड़कर ये
गुफ्तगू सरे-आम हो जाए।
ज़माना लाख रोके राह,
मगर रुकना गवारा नहीं
मिट जाए हस्ती तो क्या,
इश्क का नाम हो जाए।
- संतराम शर्मा'हिन्दी'