विज्ञापन

धुंध और ओस का दर्द

Sarthak Piyush

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            धुंध की चादर में लिपटी,
        
                                                    
                            
एक खामोश रात है,
कुहासे के सीने में छिपी,
कोई गहरी बात है।

वह रोता है बनकर कोहरा,
हर मंजर को धुंधलाता है,
अपने ही वजूद के खोने का,
वह मातम मनाता है।

सूरज की पहली किरण से,
उसका दम घुट जाता है,
मिटने से पहले वह जग को,
धुंधलके में रुलाता है।

छू नहीं पाता वो धरती को,
बस हवा में तड़पता है,
उसका यह अकेलापन,
रुह को अंदर तक काँपता है।

तभी पत्तियों की नोक पर,
एक ओस की बूँद रोती है,
मोती जैसी चमक में उसकी,
पूरी ज़िंदगी खोती है।

रात भर रोई है वो,
इस बेरहम जहाँ के लिए,
पर सुबह होते ही उसे,
मिट जाना है शमां के लिए।

क्षणभंगुर है जीवन उसका,
फिर भी वो मुस्कुराती है,
पर सूरज की तपिश उसे,
जिंदा ही निगल जाती है।

कुहासे का वो रोना,
और ओस की वो बेबसी,
दोनों मिलकर रचते हैं,
एक दर्दभरी खामोशी।

यह दर्द है उस वजूद का,
जो आकर भी ठहर न सका,
चाह कर भी इस दुनिया में,
अपना घर बना न सका।


-: सार्थक पियुष सिंह
14 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Sarthak Piyush

28 कविताएं

View Profile

Nidhhi Mukesh

22 कविताएं

View Profile