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धुंध और ओस का दर्द

                
                                                         
                            धुंध की चादर में लिपटी,
                                                                 
                            
एक खामोश रात है,
कुहासे के सीने में छिपी,
कोई गहरी बात है।

वह रोता है बनकर कोहरा,
हर मंजर को धुंधलाता है,
अपने ही वजूद के खोने का,
वह मातम मनाता है।

सूरज की पहली किरण से,
उसका दम घुट जाता है,
मिटने से पहले वह जग को,
धुंधलके में रुलाता है।

छू नहीं पाता वो धरती को,
बस हवा में तड़पता है,
उसका यह अकेलापन,
रुह को अंदर तक काँपता है।

तभी पत्तियों की नोक पर,
एक ओस की बूँद रोती है,
मोती जैसी चमक में उसकी,
पूरी ज़िंदगी खोती है।

रात भर रोई है वो,
इस बेरहम जहाँ के लिए,
पर सुबह होते ही उसे,
मिट जाना है शमां के लिए।

क्षणभंगुर है जीवन उसका,
फिर भी वो मुस्कुराती है,
पर सूरज की तपिश उसे,
जिंदा ही निगल जाती है।

कुहासे का वो रोना,
और ओस की वो बेबसी,
दोनों मिलकर रचते हैं,
एक दर्दभरी खामोशी।

यह दर्द है उस वजूद का,
जो आकर भी ठहर न सका,
चाह कर भी इस दुनिया में,
अपना घर बना न सका।


-: सार्थक पियुष सिंह
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
7 घंटे पहले

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