दिखावे के झंडों और नारों के बीच,
एक सवाल रह-रह कर उठना है।
क्या वाकई कट गई गुलामी की बेड़ियाँ,
या सिर्फ शासक का चेहरा बदलता है?
जब तक डर से सहमी है रात में बेटी,
और सच बोलने पर पाबंदी का साया है।
जब तक इंसाफ की चौखट पर न्याय महँगा,
तब तक समझो हमने सिर्फ नाम कमाया है।
आजादी नहीं है सिर्फ तारीखों का जश्न,
यह तो हर नागरिक के सम्मान का नाम है।
उसके हर झुके हुए हाथ को मिले जब न्याय,
वही स्वतंत्र देश का सच्चा पैगाम है।
आओ मिलकर वो भारत गढ़ें,
जहाँ हर सपना बेखौफ होकर पनपे,
जहाँ इंसानियत ही पहचान हो,
जहाँ हर दिल कहे - में आज़ाद हूँ,
और मेरा देश भी आजाद है।
सच्ची आजादी न सत्ता से मिलती,
न बदलती कुसिंयों से।
सच्ची आजादी मिलती है न्याय से,
समानता से, और इंसानियत से।
-: सार्थक पियुष सिंह