उलझाके रख दिया लकीरों ने हाथ की
वरना न कभी हम सहारे को खोजते
कितना सफर किया इसी कमजोर पांव से
लेकिन किसी भी हाल हम हिम्मत न हारते
कीमत बहुत रही अब तक तो अश्क की
कदमो पर किसी के इसे यूँ ही न डालते
दुनिया के हरेक शय से जो हमको थी कीमती
उसको लुटा कर आज हम दया तो न मांगते
हमने है खींचा वक्त के दरिया पर एक लकीर
नादां बहुत हैं वरना हम हरगिज न डूबते
हर शब्द को गीता की तरह पाक समझ कर
तुम्हे देवता समझा नही तो हम ऐसे न पूजते
जन्मो का साथ कहके मुझे इतना रुलाया
वरना तुम्हारी ओर हम नजर न डालते
अब खाक में मिलेंगे हम तुम देखते रहना
जो रोज बदले हम नही वो शौक पालते
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