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उलझाके रख दिया लकीरों ने हाथ की

Saroj Yadav

Mere Alfaz
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                            उलझाके रख दिया लकीरों ने हाथ की
        
                                                    
                            
वरना न कभी हम सहारे को खोजते
कितना सफर किया इसी कमजोर पांव से
लेकिन किसी भी हाल हम हिम्मत न हारते
कीमत बहुत रही अब तक तो अश्क की
कदमो पर किसी के इसे यूँ ही न डालते
दुनिया के हरेक शय से जो हमको थी कीमती
उसको लुटा कर आज हम दया तो न मांगते
हमने है खींचा वक्त के दरिया पर एक लकीर
नादां बहुत हैं वरना हम हरगिज न डूबते
हर शब्द को गीता की तरह पाक समझ कर
तुम्हे देवता समझा नही तो हम ऐसे न पूजते
जन्मो का साथ कहके मुझे इतना रुलाया
वरना तुम्हारी ओर हम नजर न डालते
अब खाक में मिलेंगे हम तुम देखते रहना
जो रोज बदले हम नही वो शौक पालते

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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