विज्ञापन

पापा गुमसुम रह लेते हैं

Saroj Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सब देख देख तुमसे सीखा
        
                                                    
                            
तेरी आँखों से ही जग देखा
माली की तरह उपवन सींचा
कल का सारा खाका खींचा
तेरी मेहनत से उपवन है ये
यदि खिला हुआ गुलशन है ये
उस पर आशीष तुम्हारा है

गिर कर उठना उठकर चलना
हर हाल में बस चलते रहना
जीने के जरूरी सबक दिए
बचपन भर साया बनके रहे
हर काम अगर मैं कर जाऊँ
हर बाधा पार जो कर पाऊँ
उसपर आशीष तुम्हारा है

पापा गुमसुम रह लेते हैं
बिन कहे मगर कह लेते है
जो बात उठे मेरे मन मे
कैसे वो उसे सुन लेते हैं
मैं कभी नही जो विफल हुई
मेरी जो भी परीक्षा सफल हुई
उस पर आशीष तुम्हारा है

सरोज यादव सरु

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
8 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Anita Chaturvedi

183 कविताएं

View Profile