विज्ञापन

मानवता जीवित रहने दो

Saroj Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            यह दृश्य अकेला काफी है
        
                                                    
                            
वो विकल वेदना कहने को
क्यों लघुता जाहिर करते हो
मानवता जीवित रहने दो
दुख दर्द सभी का साझा है
इस वक्त तो सब झगड़े छोड़ो
कश्मीर से केरल अपना है
शब्दों से नही अब घर तोड़ो
नफरत ने सारी दुनिया को
अजगर बन आज लपेट लिया
जिस देश ने इसको प्रश्रय दी
उनको ही मटियामेट किया
यह राम कृष्ण की धरती है
इसमे विषबेल नही पनपे
जो दुख में हैं सब अपने हैं
कोई आंच नही आये उनपे
समृद्ध रहे अपनी धरती
संस्कृति क्या है यह याद रखो
संवेदन जीवित रहने दो
दुखिया पर अपना हाथ रखो

सरोज यादव"सरु"

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
8 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all