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गांव का बूढ़ा पीपल जोहे परदेसी की राह

Saroj Yadav

Mere Alfaz
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                            गांव का बूढ़ा पीपल जोहे परदेसी की राह
        
                                                    
                            
मेरे जीते जी फिर बैठे वो आकर मेरी छाँह
उसके दिन देखें हैं न्यारे जब वो यहां उछलता था
मेरी छाँव में बैठा होता कुछ भी देख मचलता था
बिकने को कुछ भी आ जाये होती उसको चाह
मेरे जीते जी फिर बैठे वो आकर मेरी छाँह
बड़ा हुआ तो गुमसुम रहता जाने किन सपनो में खोता
कभी अकेले में मुस्काये कभी कभी छुप छुप के रोता
देख के उसकी रोनी सूरत मेरी निकले आह
मेरे जीते जी फिर बैठे वो आकर मेरी छाँह
एक दिन चहल पहल देखी थी सजा था राजा जैसा
तबसे नही दुबारा देखा फिर रौनक मैंने वैसा
जाने कहाँ गया फिर एक दिन पकड़के कोई राह
मेरे जीते जी फिर बैठे वो आकर मेरी छाँह
अब उसकी बगिया में शामिल उसके बड़े सयाने बच्चे
उससे अब वो दूर उड़ गए नही रहे हैं मन के सच्चे
मेरा मन सुनता है जैसे उसके मन की आह
तभी मैं चाहूँ फिर वो बैठे आकर मेरी छाँह

सरोज यादव सरु

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