बड़ी खूबसूरत चमकती मीनारें
अंधेरे में हैं जिनके कांधे खड़ीं हैं
चहकती उजालों की तारीफ सुनके
और बुनियाद तो मुँह को बांधे खड़ीं है
नही बेबसी उसकी आँखों से झाँके
वो तूफानी ताकत संभाले खड़ीं है
ये नाजुक मीनारें हैं अल्हड़ नदी सी
ये दामन को उसके संभाले खड़ीं हैं
ये सारी तबस्सुम का तोहफा इन्ही का
ये सागर हैं गम को समाये खड़ीं हैं
नही आरजू इनको जयकार की है
ऋषियों की सीरत समाये खड़ीं हैं
बड़ी खूबसूरत चमकती मीनारें
अंधेरे में हैं जिनके कांधे खड़ीं हैं........
सरोज यादव सरु
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