अमर उजाला खबरों के प्रहरी
साहित्य पर डाली तुमने दृष्टि गहरी
सारे भारत से फिर निकल पड़ी
सरस काव्य की धारा गहरी
कितने अनजानो के नाम सुने
कितनो के तुमसे पहचान बने
हर ओर सजगता दिखती है
हर विषय पर समता दिखती है
नव लेखन को तो तुमने मान दिया
भूले बिसरों को फिर सम्मान दिया
मुड़ मुड़ देखा पद चिन्हों को
जाना साहित्य के सिंहो को
भारत से बाहर तक ले पहुंचे
विश्व कवि तक भी हम पहुंचे
अपनी गलियों में हम झांकें
जो थे गौरव उनको ताकें
मेरा शहर और भी खास बना
जब सृजको का भी नाम सुना
इरशाद कराया जब हमसे
एहसास कराया है तबसे
रचनाकारों की बाते अलबेली
थीं राज जो बातें हमसे बोलीं
हम उस दिन से कुर्बान हुए
जब कविता को भी जबान दिए
जब दिए विषय हैं अलबेले
लग गए विचारों के मेले
एक बरस से ही यह साथ मिला
पर लगता सदियों का सिलसिला
मेरी दुआ है प्रिय तुम फूलों फ़लो
सौ बरस में भी तुम नवल मिलो
एक वर्ष ये अमर प्रकाश रहा
यह जन्म दिवस बड़ा ख़ास रहा
अब बार बार यह दिन आये
पाठक मन भाव यही लाये
सरोज यादव "सरु"
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