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जीवन - नौका : समय के अथाह सागर में

सुरेश पटेल

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जीवन सागर अथाह अनंत, लहरों का कोई पार नहीं,
        
                                                    
                            
सुख-दुःख की उठती तरंगें, जिनका कोई सार नहीं।
डगमग करती नाव मनुज की, आशा का दीप जलाए,
धैर्य पतवार थाम जो चलता, मंज़िल उसको मिल जाए।

क्रोध-अहं की प्रचंड हवाएँ, सपनों को बहा ले जाते।
सत्य-विवेक यदि साथ रहे तो, पथ भी सरल बन जाता,
कर्मयोग का दृढ़ नाविक ही, जीवन-पार उतर पाता।

कभी शांति की मंद बयारें, कभी प्रलय का शोर उठे,
कभी सफलता फूल बिछाए, कभी विपदाओं के तीर चुभें।
जो मुस्काकर बढ़ता जाए, संकट से न घबराता है,
वही पुरुष इतिहास रचाकर, युग का दीपक कहलाता है।

विश्वासों का लंगर गहरा, प्रेम बने जब दृढ़ आधार,
सेवा, त्याग और सदाचार, देते जीवन को विस्तार।
झूठ छलावा क्षणभर ठहरे, सत्य अमर हो जाता है,
मानवता का दीप जलाकर, हर मन मंदिर बन जाता है।

क्षणभंगुर यह काया-नौका, एक दिवस तट सो जाएगी,
पर सत्कर्मों की अमर कहानी, युगों-युगों तक गाई जाएगी।
इस जीवन-सागर में साथी, प्रेम की पतवार चलाना,
ईश्वर-विश्वास हृदय में रख, मानव होकर मानवता निभाना।
 – सुरेश पटेल "सुरेश"
एक महीने पहले
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