अनजान हूं शायद तेरे लिए मैं,
पर मैं सदियों तुमको जनता हूं।।
भले हक न हुई हो खुशियां मेरे,
पर हर दुआ तुमको मांगता हूं।।
लोग कहते है परियां होती है शायद
पर बस तुमको ही मैं जनता हूं।।
चांद को घेरती काली घटा ये,
तेरी ज़ुल्फ हैं मैं पहचानता हूं।।
किसी ने कहा है संतोषम परम सुखम
बिना तेरे? मैं ये नहीं मानता हूं।
वैसे तो हसीन है सारा जहां ये,
मेरी आंखों के लिए तुमको मांगता हूं।।
कह दूंगा अपनी दिले दास्तां तुमको,
हर रोज मैं ये ठानता हूं।।
कुछ लब्ज़ है तेरे लिए मेरी जुबां पे,
कभी कह न सकूंगा मैं ये मानता हूं।।
समझ सको तो समझो खामोशी मेरी,
अक्लमंद हो तुम मैं ये जनता हूं।।
काश होती तुम्हें भी मोहब्बत मुझसे,
पर अपनी काबिलियत मैं पहचानता हूं।।
होगी कभी हिम्मत तो कहूंगा तुमसे,
मैं कितना तुमको चाहता हूं।।
-संजीव कुमार