गोता लगाओ जलधाम में,
कुएँ में क्यों टर्राते हो?
झाँको निज अंतर्मन में,
बाहर क्यों पल गँवाते हो?
निराकार के अंश स्वयं तुम,
रूप में क्यों फँस जाते हो?
माटी के इस तन के पीछे,
निज हस्ती क्यों गँवाते हो?
अंतरा 1
अरे! तोड़ भी जग भ्रम को रे,
छोड़ सभी अब लोक-हया रे,
क्यों बनकर तुम सदा शिकारी,
खुद ही शिकार हो जाते हो?
आए हो सुख के ही खातिर,
क्यों भोग्य स्वयं हो जाते हो?
माया के इस मोह-जाल में,
क्यों स्वयं स्वयं को खो जाते हो?
मुखड़ा
गोता लगाओ जलधाम में,
कुएँ में क्यों टर्राते हो?
झाँको निज अंतर्मन में,
बाहर क्यों पल गँवाते हो?
अंतरा 2
छोड़ो ढोंग दिखावा अपना,
पौधे कुछ कर्म से उगा लो,
सूखी इस भू के आँचल में,
हरियाली फिर से बसा लो।
फूल खिलेंगे जब डालों पर,
हर ओर महक ही रे होगी,
तेरे कर्मों की सुगंध से,
धरती भी आनंदित होगी।
अंतरा 3
जिस दिन छोड़ोगे यह तन रे,
छूटेगा भी जग का मेला,
कर्मों से न हीक रे होगी,
महकेगा जीवन का रेला।
भीगेंगी पलकें अपनों की,
पराए भी रोते मिलेंगे,
नभ से लोचन जल बरसेंगे,
बादल संग संग रो देंगे।
अंतरा 4
राख सदा हो तन मरघट में,
पर कर्म अमर रह जाएँगे,
तेरी रवानगी की खुशबू,
सुदूर सदा फैल जाएगी।
गुलाब-सी हो रवानगी रे,
काँटों में भी मुस्कान रहे,
जाते-जाते इस दुनिया में,
यही निराला पहचान रहे।
समापन
निराकार के अंश स्वयं तुम,
निराकार में मिल जाओगे,
मिट जाएगा 'मैं' भी इक दिन,
खुद में स्वयं समा जाओगे।
गोता लगाओ जलधाम में,
कुएँ में क्यों टर्राते हो?
बाहर जिसको खोज रहे हो,
स्वयं तुम, क्यों भूल जाते हो?
-संजय निराला