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विविध रंग के पंख संजीले

Sanjai kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            रंग-बिरंगी तितली रानी,
        
                                                    
                            
रोज कहाँ से आती हो,
हमें लुभाकर, जी बहलाकर,
चली कहाँ तुम जाती हो ?

फूल-फूल पर, कली-कली पर,
इधर-उधर इठलाती हो ।
समझ न पाता, धुन में ऐंठी
क्या दिनभर तुम गाती हो ?

रंग-बिरंगे पंख दिखाकर,
बच्चों को ललचाती हो ।
हाथ बढ़ाते ज्यों पकड़न को,
तुम फौरन उड़ जाती हो ।

विविध रंग के पंख संजीले,
कहाँ-कहाँ से लाती हो ।
जी चाहे कि पकड़ अभी लूँ,
इतना जी को भाती हो ।।

हमें बताओ तितली रानी,
कौन लोक से आई हो ?
जी करता कि झूम के गाएं,
इतनी खुशियां लाई हो।।

काश ! हमारे भी पर होते,
हम भी साथ तुम्हारे जाते ।
उसी लोक से हम भी रानी,
रंग-बिरंगी खुशियां लाते ।।
एक घंटा पहले
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