रूठ गए थे एक दिन कान्हा,
अपनी यशोमति मइया से ।
बोले–‘अब ना हमें चिढ़ाएं’,
कह दो हलधर भइया से ।।
रोज-रोज वह मुझे चिढ़ाते,
‘माता ने तुम्हें खरीदा है,
नंद बाबा का लाल नहीं हूं,
न मइया मेरी यशोदा है।।’
‘गोरे हैं जब बाबा इतने,
तुम भी गोरी कहते ।
फिर मैं कैसे काला हूं,
हैं नाक हमारे बहते ।।
सच क्या है तुम मुझे बताओ,
लगती दिल पर ठेस ।’
मचल रहे हैं कहते कान्हा,
पकड़े कर से केश ।।
बोली मइया-धूर्त बहुत है
हलधर, सुन रे कन्हैया ।
नंद बाबा ही पिता हैं तेरे,
और मैं ही तेरी मइया ।।
काले नैनों वाली राधा के,
बालों का रंग काला ।
सच कहती हूं कसम हमारी,
इसीलिए तूं काला ।।
चित ना धरो बातों का बेटा,
दाऊ से मैं हारी ।
कैसे अब समझाऊँ तुझको,
मैं तुझ पर बलिहारी ।।
तुझे चिढ़ा कर स्नेह जताता,
करता तुझे दुलार ।
छेड़छाड़ कर खुश होता है,
यही तो है हलधर का प्यार ।।
भाई का भाई पर होता,
पूरा-पूरा अधिकार ।
मत वंचित कर इससे बेटा,
अब ना बढ़ा दाऊ से रार ।।
“लो, फिर रो दी न ! अब
मत अश्रु बहा तूं अम्ब ।
कभी शिकायत नहीं करूंगा,
हँस दो ना अविलम्ब ।।
दाऊ बोले–“ मोल लिए हैं,
सुन ले पुनः कन्हैया।”
इतने नाटे क्यों हो? सोचो–
बहलाती तुमको है मइया ।”
ले मुरली दौड़ाय लियो तब,
भागे हलधर भइया ।
अँचरा से मुँह ढाँप के हँसती,
लोट-पोट हो मइया ।।