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बात-बात पर डांट लगाती–

Sanjai kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक दिन राजू रूठ गया था,
        
                                                    
                            
अपनी प्यारी मम्मी से।
बोला–‘जा रहा मै घर छोड़,
चल कपड़े दे जल्दी से ।।’

जी लूँगा मैं कहीं भी रहकर,
बाग-बगीचे, जंगल में ।
मुझे ढूँढते मत तुम आना,
पीछे-पीछे जंगल में।।

बात-बात पर डांट लगाती–
‘कहाँ गये थे? अभी को आये?
यह न करो, वहाँ न जाओ,
दूध नहीं पी? फिर मैगी खाए?’

तंग हो गया मैं सुन–सुन कर,
सुबह, दोपहर, शाम ।
अब समझोगी, रहो अकेले,
यहाँ न मेरा कोई काम ।।

अरे! यह क्या? तुम रोती हो?
क्या हो गया आज तुम्हें ?
अच्छा, समझा! शायद पापा ने,
डाँटा फिर से आज तुम्हें ।।

लो! नहीं जाता मैं तुम्हें छोड़,
अब तो चुप हो, मान जा माँ!
तुम्हें छोड़कर प्यारी मम्मी !
जा सकता मैं भला कहाँ ?
एक घंटा पहले
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