एक दिन राजू रूठ गया था,
अपनी प्यारी मम्मी से।
बोला–‘जा रहा मै घर छोड़,
चल कपड़े दे जल्दी से ।।’
जी लूँगा मैं कहीं भी रहकर,
बाग-बगीचे, जंगल में ।
मुझे ढूँढते मत तुम आना,
पीछे-पीछे जंगल में।।
बात-बात पर डांट लगाती–
‘कहाँ गये थे? अभी को आये?
यह न करो, वहाँ न जाओ,
दूध नहीं पी? फिर मैगी खाए?’
तंग हो गया मैं सुन–सुन कर,
सुबह, दोपहर, शाम ।
अब समझोगी, रहो अकेले,
यहाँ न मेरा कोई काम ।।
अरे! यह क्या? तुम रोती हो?
क्या हो गया आज तुम्हें ?
अच्छा, समझा! शायद पापा ने,
डाँटा फिर से आज तुम्हें ।।
लो! नहीं जाता मैं तुम्हें छोड़,
अब तो चुप हो, मान जा माँ!
तुम्हें छोड़कर प्यारी मम्मी !
जा सकता मैं भला कहाँ ?
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