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पतंग उड़ाएं

Sanjai kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आओ मिलकर पतंग उड़ाएं,
        
                                                    
                            
आई मनभावन खिचड़ी।
रंग-बिरंगी अजब निराली,
यह पतंग अब उड़ी उड़ी।
पतंग उड़ाएं, लाई खाएं,
महक रही है खिचड़ी।
भूजा करता पेट सफाई,
गुड़ की महिमा बहुत बड़ी।

मकर संक्रांति पर्व निराला,
कहते जिसको खिचड़ी।
बच्चे, बूढ़े सभी मगन हैं,
यह पतंग अब उड़ी उड़ी।
घर-घर में गुड़, चावल, तिल,
भुजा-कुटा के बनती लाई।
सोंधी महक धोंधे की बोले,
नए वर्ष संग खिचड़ी आई।।

––संजय कुमार गुप्त 'अबोध’
4 घंटे पहले
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