दीदी, यह नन्हा पौधा देखो!
कैसे धरा फोड़कर निकला है।
केवल दो ही पत्ते इसके,
पर रहा यह कैसे इठला है।
कितनी नाजुक तना है इसकी,
हरी-भरी मन को भाती,
किसने इसे बनाया दीदी,
हवा भी इसको सहलाती।
मिट्टी में यह कहाँ से आते,
बाहर कौन बुलाता है?
क्या खाते-पीते यह अंदर,
इनको कौन सुलाता है ?
यह नन्हा पौधा है टिंकू,
बहुत ही ताकतवर,
धरा फोड़कर स्वयं ही निकला,
यह मिट्टी से बाहर ।
सोया रहता मस्ती से यह,
नन्हे बीज के भीतर,
बीज दबे जब मिट्टी में,
तब यह आता बाहर ।
खुदा बनाया इसको भी,
पवन इसे सुलाता है,
खाना पानी मिट्टी देता,
बाहर भानु बुलाता है ।।