कुहूँ-कुहूँ आवाजें करती
इस डाली, उस डाली फिरती
हम बच्चों के मन को हरती
जीवन में खुशहाली भरती।
पत्तों में जो छिपकर बैठी
सदा ही धुन में अपने ऐंठी
ठण्डक जाने जब लगती है
गरमी जब आने लगती है ।
ऋतुराज जब आ जाता है
मादकता तब छा जाता है
तभी कूँकती कोयल काली
गाती-फिरती डाली–डाली ।
पेड़ों के पत्ते झर जाते
नये-नये पत्ते हैं आते
चारों ओर हरियाली होती
धरा की छवि निराली होती ।
फूलों से डालें लद जाती
नन्हीं फलियाँ हैं लग जाती
मंद पवन चलने लगता है
दिशा महकने तब लगता है।
तब कोयल मतवाली होकर
मधुर सुरों में कूँ-कूँ गाती
अपनी मीठी वाणी से बच्चों!
सबके मन को बहलाती।
हमें चाहिए मीठा बोलें,
जब भी मुँह अपना हम खोलें,
हम भी सबके अपने हो लें,
ऐसी मीठी वाणी बोलें ।।