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अबोध के दोहे

Sanjai kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अबोध, अबोध अनवरत, अग्रसर अवनति ओर।
        
                                                    
                            
निकल चाप से ज्यों चला, अग्र शर अव्य की ओर।। 1

कह अबोध कैसे तरें, भव से आज पतंग ।
ईश भक्ति के बदले ये, निशि -दिन करें बतंग।। 2

करत-करत प्रभु ध्यान ते, हरि का होत इंसान।
पाय सद्गति अंत में, जग में होय महान।। 3

खुद का सोचा खुद गया, लाख करे चतुराय।
स्वार्थ नरक का पंथ है, स्वार्थ न सोचो भाय।। 4

त्याग निद्रा ऐ विहंगे ! चित्त का अवधान कर।
खोल नेत्र व देख जहां, सत्य की पहचान कर।। 5

मम विपदा सारी हरो, सोइ चंचला राधा ।
सुन नूपुर झंकार जेहिं, होय प्रफुल्लित कांधा।। 6

दौलत पे सब जग मरे, प्रभु पे मरे ना कोय।
जो अबोध प्रभु पे मरे, वही प्रभु का होय।।7

आप बड़ाई जे करे, ते ’अबोध’ बड़ नीच।
उलटि जनम फिर फिर पड़े, अधम योनि के बीच।। 8

संपत्ति काले सब मिले, विपत्ति समय ना कोय।
विपत्ति समय में जो मिले, निज अबोध सो होय।। 9

भले दिनन में सब सगे, बुरे दिनन ना कोय।
पड़ा विपत्ति कि छोड़ चले, निज ‘अबोध’ जो कोय।।10
–– संजय कुमार गुप्त ‘अबोध’
2 घंटे पहले
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