सो रहे हो तुम वहाँ, मैं सो नहीं पाऊँगी अब,
चाँदनी ढलती रही, ख़ामोश रह जाऊँगी अब।
इस किनारे मैं खड़ी हूँ, उस किनारे तुम खड़े,
दरमियाँ दुनिया खड़ी तो पार कर जाऊँगी अब।
तीर नज़रों के चलाकर रोकते हो रास्ता,
राह तकते ही तुम्हारी रात भी ढलने लगी।
साँवरे की चाह में मीरा दीवानी हो गई,
बुझ गए तारे फ़लक के, ख़्वाब क्या लाऊँगी अब?