आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

सांवरे की चाह

                
                                                         
                            सो रहे हो तुम वहाँ, मैं सो नहीं पाऊँगी अब,
                                                                 
                            
चाँदनी ढलती रही, ख़ामोश रह जाऊँगी अब।
इस किनारे मैं खड़ी हूँ, उस किनारे तुम खड़े,
दरमियाँ दुनिया खड़ी तो पार कर जाऊँगी अब।
तीर नज़रों के चलाकर रोकते हो रास्ता,
राह तकते ही तुम्हारी रात भी ढलने लगी।
साँवरे की चाह में मीरा दीवानी हो गई,
बुझ गए तारे फ़लक के, ख़्वाब क्या लाऊँगी अब?
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
28 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर