क्या गुलों से दोस्ती और दुश्मनी।।
कौन कह देगा तुम्हें अब हमनशीं।।
दोस्ती के नाम पर भी करना दग़ा,,
तुम्हीं कहो ये है कहाँँ की दोस्ती।।
दूर रहना है तो रह लो शौक से,,
मैं तो कहता हूं इसे बस बुज़दिली।।
गर मिलो तो ऐसे मिलो तपाक़ से,,
देखने वालों को लगे ये आशिक़ी।।
चाँदनी रातों में ही छत पर घूमना,,
क्या अमावस की नहीं ये बेरुख़ी।।
दिन गुजारोगे हमेशा अपनी तरह,,
हैं कहाँ की तुम कहो ये ज़िंदगी।।
जब मिले थे कितने हसीं लगते थे,,
देख लो कहाँ ले आयी ये जिंदगी।।
जिस तरह मिलते रहे तुम रोज़ ही,,
मैं समझता रहा इसे दरियादिली।।
आँख में दरिया को तेरी देख देव,,
याद आयी मुझको आज तिश्नगी।।
-सुनील देव