जहां तक जानता हूं मैं तेरा तो काम अच्छा था।।
शहर के दरमियाँ रईसों में इक मकान अच्छा था।।
आखिर क्या हुआ जो छोड़कर दुनियाँ चले आए,,
तेरे तो पास मुझसे भी साज़ो सामान अच्छा था।।
वज़ह क्या हो गई जो आज इतने उदास बैठें हो,,
ज़मीं थी खुशनुमा तेरी सर पे आसमान अच्छा था।।
वज़न पलकों पे क्यूँ ये दरिया का उठाए फिरते हो,
समंदर दूर था तुझसे ग़मो का मचान अच्छा था।।
कोई तो बात है वरना कभी तुझे ऐसा ना देखा देव,
ज़िंदगी खुशरंग जीने का सारा इंतज़ाम अच्छा था।।
-सुनील देव