काम की ज्वाला में जल क्या मिला किसको यहां।
आग भी खुद ही लगाई जिस्म भी खुद का जला।
क्यूँ बुरा कहते किसी को यहां कौन है बता दूध सा
सब के सब यहाँ एक से है कभी आईने में देखना।
आज जिस सूरत पे तुमको नाज़ है और गुरूर है,,
मिट्टी में मिल जाएगी कभी अपनी आंखों देखना।
रह गया हर साथ पीछे कोई साथ हैं ना क़रीब है,,
दोस्ती हो या दुश्मनी बस यहाँ जीते जी की दास्ताँ।
अब तलक जो सो रहे हैं यहाँ सोते ही रह जाएंगे,,
ना कभी कोई साथ देगा ना बाप की दौलत यहाँ।।
वास्ते और रास्ते यहाँ गर काम के तो चलते रहो ,,
वरना क्या रखा है सब हो जाएगा इक दिन हवा।।
दोस्ती किसी शख़्स की देव रास ना आयी कभी,,
धड़कनें ही रुक गई लेकिन मिल ना पाया कारवाँ।
-सुनील देव