नज़्म
क्या ये सच है के तुम मुझे प्यार नहीं करते
फिर मेरे वादों पर क्यों नहीं एतबार करते
क्यूं ये कहते हुए डरते हो तुम
की मरते हो, मुझपे मरते हो तुम
की तुम्हारे बिन मेरा दिल नहीं लगता
की तुम्हारे बिन मेरी ज़िन्दगी अधूरी है
की तुम्हारे बिन मेरी हर खुशी अधूरी है
की तुम्ही से मेरी ज़िन्दगी पूरी है
की तुम्हारे बिन हर मौसम पतझड़ का मौसम है
की तुम्हारे बिन आँखें हरदम मेरी नम हैं
की तुम्हारे बिन जीवन व्यर्थ रेगिस्तान सा
की तुम्हारे बिन सबकुछ इक शमशान सा ।
क्यूं हर बार खामोश रह जाते हो तुम
बोलो कभी तुम भी बोलो की
मुझसे प्यार करते हो तुम ।।
डॉक्टर संबोध 'शैली'
एसोसिएट प्रोफेसर
इतिहास, स्व. पं. न. कि. श.रा. स्नातकोत्तर महाविद्यालय,
दौसा , राजस्थान।