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वर्दी की गरिमा पे दाग न लगना चाहिए,

संजय एम

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            रक्षक ही बन बैठे भक्षक!
        
                                                    
                            

जिस थाने में सुरक्षा की उम्मीद ले आई,
वहीं इंसानियत शर्मसार करने हो आई।
जिस वर्दी पर विश्वास जताया था उसने,
उसी 'वर्दी' पर सवालों की बौछार आई।

यूं पति के अत्याचारों से बचने की आस,
कानून के दरवाजे पर न्याय की तलाश।
सोचा पुलिस उसे "सुरक्षा" प्रदान करेगी,
हाँ, आरोपों ने व्यवस्था की पोल खोली।

जिस हाथ में 'कानून' की जिम्मेदारी थी,
क्या? उसमें ऐसी भी कोई लाचारी थी?
जिसे जनता का रक्षक बनकर रहना था,
वो कम्बख्त आरोपों के घेरे में खड़ा था।

वर्दी की गरिमा पे दाग न लगना चाहिए,
रक्षक को कभी भक्षक न बनना चाहिए।
थाने की चौखट पे जब विश्वास टूटता है,
आमजन का कानून से भरोसा उठता है।
(संदर्भ-गम्हरिया थाने में भी बहू-बेटी असुरक्षित)
-संजय एम तराणेकर
 
एक दिन पहले
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