तुम अच्छी लगती हो सादगी वाले चेहरे में,
जींस-कुर्ती, बिखरी ज़ुल्फ़ें और बरसात के पहरे में।
तुम उससे भी ज़्यादा अच्छी लगती हो,
जब तुम मिल-जुलकर रहती हो माँ-पिताजी, भाई-बहन, सहेलियों सबसे।
और करती हो प्रेम गिलहरियों, पक्षियों, नदियों,
पहाड़ों और प्रकृति से।
और सच कहूँ, तब तुम बहुत अच्छी लगती हो,
जब तुम आवारा, बिगड़ैल, चरित्रहीन लोगों से रहती हो मीलों दूर।
और समझती हो सम्मान, प्रतिष्ठा और चरित्र को ही अपना कोहिनूर।
-नाम सागर