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ग़ज़ल: अपने ही पराये निकले

SACHIN PRAJAPATI

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हमने जिनको दुआओं में माँगा, वही ज़ख़्म दे गए,
        
                                                    
                            
जो थे अपने सबसे ज़्यादा, वही सबसे पहले छोड़ गए।

ग़ैरों से क्या शिकवा करते, वो तो पहले से ही थे अजनबी,
दर्द तो तब हुआ जब अपने ही चेहरे बदल गए।

हक़ीक़त की बात की हमने, तो गुनहगार बना दिया,
सच बोला तो रिश्तों के शीशे, एक पल में टूट गए।

हमने हर हाल में निभाया, हर दर्द चुपचाप सहा,
वो हँसते रहे हमारी खामोशी पर, और आगे बढ़ गए।

जिस कंधे पर सर रख कर रोते थे सुकून की खातिर,
उसी कंधे से धक्का देकर, हमें तन्हा कर गए।

अब भरोसे से डर लगता है, मुस्कान भी शक़ में है,
क्योंकि अपने ही दिल के क़ातिल बन कर सामने खड़े हो गए।

आज खामोश हैं तो क्या हुआ, ये कमजोरी नहीं हमारी,
हम टूट कर भी जिंदा हैं, और वो जीते जी मर गए।
-सचिन प्रजापति!!
8 महीने पहले
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