विज्ञापन

इश्क़ में धोखा

saadat suhail

Mere Alfaz
विज्ञापन
                                    
                                                                        
                            इश्क़ में धोखा खाया हूं दहल उठी दिल कि दीवारें,
        
                                                    
                            
दावा करूं या तड़पता ख़ुद को मैं छोड़ दूँ...

कितनी मिन्नतें, कितनी आरज़ूं , कितनी जुस्तजूं, मैं करूँ,
इंसान ही तो हूं, जान दूँ या जाने दूँ बता क्या मैं करूँ 

लेकर ग़मों का बोझ नंगे पांव चल रहा हूं मैं,
मोड़ दूं या राह तेरी मैं छोड़ दूँ...

तरसती हैं नज़रें हर पल याद में तेरी,
राहों को छोड़ूं, या ताकना राह को छोड़ दूँ....

एहसास है मुझे हर एक पल, हर एक लफ़्ज़ का जो तुझसे मिला,
भुला दूँ सब, या मैं एहसास करना छोड़ दूँ...

साँसो में बहता तू पल-पल है मेरे,
रिस-रिस के लूँ, या मैं साँस लेना छोड़ दूँ...

मरना न था जीना था मुझे सदा संग तेरे,
भूल गई है तू, क्या मैं भी जज़्बातों को तोड़ दूँ...

चल मान लिया हमने ग़लती हमारी होगी,
तो फिर क्यूँ , क्यूँ तू बचता है नज़रें मिलाने से,
तुझसे ना पूछूँ,
पल पल मरता मैं रहूँ,
क्या सब कुछ दिल में दबा ही मैं छोड़ दूँ.....

ग़ैरों की बातों पे, यक़ीन तूने पल में किया,
अपना कभी ना समझा, धोखा तूने दिया,
दिखावा था सब, मतलब का साथ रहा,
कुछ ना पूछूँ, तरह तेरी मैं भी मुँह मोड़ दूँ...

कोशिश तूने भी कभी कुछ तो की होती,
कुछ मैं करूँ या अब सब रब पे छोड़ दूँ...

अब तू ही बता, क्या मैं करूँ

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें। 
8 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

User

26 कविताएं

View Profile

Sudhir Khatri

562 कविताएं

View Profile