जब ज़ोर न चले बाजू का,
और तर्कों की हो जाए हार,
तो गढ़े जाते हैं मनगढ़ंत किस्से,
चलाए जाते हैं चरित्र पर वार।
स्त्री को कमज़ोर करने की,
यह सबसे पुरानी चाल है,
लगा दो दाग़ दफ्तर या घर में,
हर ज़ुबाँ पर फिर सवाल है।
सोचते हैं टूट जाएगी वो,
सुध-बुध उसकी खो जाएगी,
अकेली पड़ जाएगी कोने में,
खुद से ही नज़रें चुराएगी।
पर वो अबला नहीं, अबला का भ्रम तोड़ो,
वो अग्नि है, जलना सीख चुकी है,
इन झूठे लांछनों के पत्थरों से,
उसने अपनी इमारत सींची है।
चरित्र के झूठे प्रमाण पत्रों से,
अब वो डरती नहीं, संवरती है,
हर वार को सीने पर झेलकर,
वो और ज़्यादा निखरती है!
-रूपा