आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

चरित्र का खंजर

                
                                                         
                            जब ज़ोर न चले बाजू का,
                                                                 
                            
और तर्कों की हो जाए हार,
तो गढ़े जाते हैं मनगढ़ंत किस्से,
चलाए जाते हैं चरित्र पर वार।
स्त्री को कमज़ोर करने की,
यह सबसे पुरानी चाल है,
लगा दो दाग़ दफ्तर या घर में,
हर ज़ुबाँ पर फिर सवाल है।
सोचते हैं टूट जाएगी वो,
सुध-बुध उसकी खो जाएगी,
अकेली पड़ जाएगी कोने में,
खुद से ही नज़रें चुराएगी।
पर वो अबला नहीं, अबला का भ्रम तोड़ो,
वो अग्नि है, जलना सीख चुकी है,
इन झूठे लांछनों के पत्थरों से,
उसने अपनी इमारत सींची है।
चरित्र के झूठे प्रमाण पत्रों से,
अब वो डरती नहीं, संवरती है,
हर वार को सीने पर झेलकर,
वो और ज़्यादा निखरती है!
-रूपा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर