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छप्पन भोग यहाँ महलों के, केवल कोरा आडंबर

Rohit Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सूखी रोटी चबा रहा जो, वही सत्य को पाता है,
        
                                                    
                            
जैसे कोई तपा मुसाफिर, मरुथल में जल ध्याता है।
महलों का वैभव तो केवल, एक छलावा होता है,
सोने का पिंजरा भी जैसे, वन-पंछी को रुलाता है।

छप्पन भोग यहाँ महलों के, केवल कोरा आडंबर,
जैसे कोई रेत का घर हो, ढह जाता क्षण भर में पर।
भूख विकल अंतर की ज्वाला, यज्ञ-कुंड की समिधा है,
अमीरी की यह झूठी रंगत, ओस-बूँद सा एक मंज़र।

मजबूरों का बहता आँसू, सावन की घन-घोर घटा,
जैसे कोई सूखी धरती, सहती आई वज्र-छटा।
दिखावे की दुनिया सारी, कागज़ के फूलों जैसी,
सच्चा जीवन-रस तो केवल, कुटिया में ही गया अटा।
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
एक महीने पहले
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