आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

छप्पन भोग यहाँ महलों के, केवल कोरा आडंबर

                
                                                         
                            सूखी रोटी चबा रहा जो, वही सत्य को पाता है,
                                                                 
                            
जैसे कोई तपा मुसाफिर, मरुथल में जल ध्याता है।
महलों का वैभव तो केवल, एक छलावा होता है,
सोने का पिंजरा भी जैसे, वन-पंछी को रुलाता है।

छप्पन भोग यहाँ महलों के, केवल कोरा आडंबर,
जैसे कोई रेत का घर हो, ढह जाता क्षण भर में पर।
भूख विकल अंतर की ज्वाला, यज्ञ-कुंड की समिधा है,
अमीरी की यह झूठी रंगत, ओस-बूँद सा एक मंज़र।

मजबूरों का बहता आँसू, सावन की घन-घोर घटा,
जैसे कोई सूखी धरती, सहती आई वज्र-छटा।
दिखावे की दुनिया सारी, कागज़ के फूलों जैसी,
सच्चा जीवन-रस तो केवल, कुटिया में ही गया अटा।
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
21 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर