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श्रम-साधना की परिणति पावन

Rohit Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            नव प्रभात का तेज प्रखर है
        
                                                    
                            
शत्रु-दलित यह धरा प्रमुदित है
कंटक-पथ पर बढ़े चरण हैं
मन में दृढ़ संकल्प-करण हैं

तम का संहारक उदित हुआ है
सत्य-सनातन मुखरित हुआ है
भय का बंधन छिन्न हुआ है
नवल सवेरा खिन्न हुआ है

रण-भेरी का नाद प्रचंड है
मस्तक पर जय-तिलक अखंड है
भुजबल में असीम हुंकार है
अरि-मर्दन का शुभ सत्कार है

काल-चक्र को मोड़ दिया है
दुर्भेद्य दुर्ग को तोड़ दिया है
पुरुषार्थ का ध्वज लहराया है
सौरभ चहुँदिश फैलाया है

अग्नि-परीक्षा में जो तपे हैं
वे ही जग में अमर छपे हैं
संकट में जो अविचल ठाढ़े
उनके यश के कीर्ति-कवाड़े

विघ्नों का पारावार तजा है
शौर्य का नूतन शंख बजा है
श्रमिक स्वेद का मिला सुफल है
निश्चय ही यह अति विमल है

अंधकार पर ज्योति भारी है
यह तो न्याय की परम सवारी है
अन्यायी का दर्प ढहा है
न्याय-सिंधु का प्रवाह बहा है

श्रम-साधना की परिणति पावन
जैसे मरु में बरसे सावन
धैर्य-पुंज का प्रतिफल आया
मन-उपवन में हर्ष समाया

होता वीरों का सम्मान है
गाती धरती मंगल-गान है
बढ़ता भारत का सम्मान है

कोटि-कंठ का एक स्वर है
विजय-मुकुट पावन प्रखर है
सत्यमेव जयते का नारा
गुंजित करता विश्व सारा

— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
एक दिन पहले
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