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महा नगरीय दौड़ में छूटी जड़ें

Rohit Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ऊंची-ऊंची इन दीवारों का कैसा अंधा चश्मा है,
        
                                                    
                            
वैभव की अंधी नगरी में हर रिश्ता यहाँ तरसता है।गाड़ियों का यह शोर सुने, डॉलर की भाषा को समझे,
पर बूढ़े बाप के कोने का सूनापन कहाँ समझता है।

चौदहवीं मंजिल की खिड़की से आँखें जो नीचे तकती हैं,
वो गाँव के छूटे आँगन को दिन-रात याद ही करती हैं। जहां नीम की ठंडी छांव रही, चूल्हे की सोंधी खुशबू थी,
उस खुले गगन को छोड़ यहाँ, पिंजरे में सांसें घुटती हैं।

स्मार्टफोन की इस दुनिया में इंसान हुआ कितना अंधा,
हर हाथ में चमकीली स्क्रीन, पर भीतर का दीया मँदा। महलों के नक्शे साफ दिखें, तरक्की की ऊंची राह दिखे,
पर कांपते हाथों का रोना देख न पाए यह बंदा।

ओ दौड़ रहे अंधे राही! तूने सब पाया, क्या पाया,
जब घर की बूढ़ी आंखों का तू आँसू भी न पोंछ पाया।कंक्रीट के इस ऊंचे जंगल में आज मोतियाबिंद छाया,
महलों की चमकीली ईंटों ने अपनों का दर्द छुपाया।
3 महीने पहले
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