आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

महा नगरीय दौड़ में छूटी जड़ें

                
                                                         
                            ऊंची-ऊंची इन दीवारों का कैसा अंधा चश्मा है,
                                                                 
                            
वैभव की अंधी नगरी में हर रिश्ता यहाँ तरसता है।गाड़ियों का यह शोर सुने, डॉलर की भाषा को समझे,
पर बूढ़े बाप के कोने का सूनापन कहाँ समझता है।

चौदहवीं मंजिल की खिड़की से आँखें जो नीचे तकती हैं,
वो गाँव के छूटे आँगन को दिन-रात याद ही करती हैं। जहां नीम की ठंडी छांव रही, चूल्हे की सोंधी खुशबू थी,
उस खुले गगन को छोड़ यहाँ, पिंजरे में सांसें घुटती हैं।

स्मार्टफोन की इस दुनिया में इंसान हुआ कितना अंधा,
हर हाथ में चमकीली स्क्रीन, पर भीतर का दीया मँदा। महलों के नक्शे साफ दिखें, तरक्की की ऊंची राह दिखे,
पर कांपते हाथों का रोना देख न पाए यह बंदा।

ओ दौड़ रहे अंधे राही! तूने सब पाया, क्या पाया,
जब घर की बूढ़ी आंखों का तू आँसू भी न पोंछ पाया।कंक्रीट के इस ऊंचे जंगल में आज मोतियाबिंद छाया,
महलों की चमकीली ईंटों ने अपनों का दर्द छुपाया।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर