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कविता: उठा कसम अब रण की भाग 2

Rohit Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अब सहने का वह दौर गया, अब सिंहनी वन से जागेगी,
        
                                                    
                            
जो आँख उठेगी हवस लिए, वह अपनी मौत को माँगेगी।
तुम समझ रहे थे मौन जिसे, वह ज्वालामुखी का लावा है,
अब न्याय करेगी खुद नारी, यह महाकाल का बुलावा है।

वो मोमबत्ती की राख नहीं, अब शोला बनकर भड़की है,
इंसाफ़ की खातिर आज गली, हर चौराहे पर कड़की है।
घूंघट के पीछे छुपने वाली, अब ढाल-तलवार उठाएगी,
जो छुएगा मैली नीयत से, वह लाश वहीं गिर जाएगी।

इतिहास गवाह है जब-जब भी, नारी ने रौद्र रूप धरा,
महिषासुर जैसे दानव का, पल में ही संहार करा।
अब बंद करो ये खोखले भाषण, अब संसद को भी सुनना होगा,
बेटियों की इस हिफाजत का, रास्ता तुमको ही चुनना होगा।

कानून की जो ये कछुआ चाल, अपराधियों को सह देती है,
हर तारीख पर रोती माँ, बस आँसू अपने पीती है।
अब तोड़ो इन अदालतों के, इस ठंडे पड़े निज़ामों को,
सड़कों पर ही अंजाम मिले, उन वहशी और गुलामों को।

ये नए भारत की नारी है, ये सहना अब भूल चुकी,
अन्याय के पिंजरे को तोड़, आकाश में ऊँचा झूल चुकी।
अब हाथ उठे तो याद रहे, कि बदला तुरंत ही आएगा,
जो लहू बहा था सड़कों पर, वो इंकलाब कहलाएगा।

- रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
11 घंटे पहले
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